नारी के प्रति पुरूषों का प्यार

आपने देखा ही होगा कि आजकल पुरुष जानवर से भी बदतर हो गए हैं ।उनको कुछ दीखने वाला नहीं है। हवस के अलावा पता नहीं क्या दिमाग में लिए फिरते हैं। पुरुष स्त्रियों के प्रति हमेशा नोच खाने का मन कहता है । स्त्रिया कहां कहां तक बचे पुरुषों से स्त्रियां किस-किस जगह बचे हैं ।घर में बचे हैं। अपने आसपास के लोगों से बचें ,अपने रिश्तेदारों से बचें, समाज में बचे ,ऑफिस में बचे, स्कूल में बचे ,ट्रैवल करते समय बचे,रोड पर चलते समय बचे, कहां-कहां अपने आबरू को बचाएं स्त्रियां।हर जगह इन्हें खतरा पर हर जगह बचाने वाला कोई शख्स नहीं, ना ही सरकार की तरफ से ना ही आम आदमी ना ही समाज की तरफ से कुछ समाज और कुछ सरकार की व्यवस्था को छोड़कर । और देखा जाए तो   पुरूष का प्यार तब तक प्यार के लिए छलकता है। जब तक वो स्त्री को स्पर्श ना करले।

और जब तक वो स्त्री स्पर्श को छू नहीं पाता उसके लिए वो सबकुछ होती है।

और जैसे ही स्त्री उस पर भरोसा करती है।अपनी दुनिया समझने लगती है ।और अपना सब कुछ सौप देती है।और अपने आप को उसकी बाहों में बर्बाद कर देती है ।चंद मन के विकार के लिए। और अपना तन मन सब कुछ लुटाने के बाद वह वह स्त्री पुरुष को

अचानक से वो उसे घिनौनी लगती है। ,चरित्र हीन लगने लगती है।

ऐसा क्यों होता है। क्या स्त्रियां इतना समाज से बेकार हो गई हैं। कि पुरुष के बाहों में आने के बाद उन्हें दुत्कार दिया जाता है। बाहों में आने से पहले सारा प्यार हैं ।बाहों में आ जाने के बाद दुर्गंध देने लगती हैं। यह कैसी मानसिकता है ।पुरुषों की

उस स्त्री ने तो उसे भगवान माना है । इसके आगे पीछे कुछ नहीं सोचा है।अच्छा बुरा कुछ सोचा ही नहीं।वह पुरुष मेरे साथ क्या कर सकता है। वह तो यही सोच कर अपने आप को पुरुष के बाहों में सौंप देती है। कि यही मेरी दुनिया और सब कुछ है।

लेकिन पुरूष तो प्यार करता ही नहीं था। वो तो सिर्फ और सिर्फ उसके शरीर को पाना चाहता था। 

उसके जज्बात उसका प्यार या उसका सम्मान उसके लिए सब एक दिखावा है ।आजकल पुरुष स्त्रियों को खेल समझकर खेलते हैं ।और स्त्रियां अपने आप इस खेल में फंस जाती है। और कुछ चंद प्यार दिखावा के लिए अपना सब कुछ गंवा देती है।मैं तो इसको प्यार नहीं कहता मैं तो यह कहता हूं। कि  पुरुषों का हवस पन है।

वो बस यही तक आना चाहता है। औरत के साथ 

अगर पुरूष इतना पवित्र है। तो  क्यूँ वो हर औरत को वासना की नजर से देखता है ।क्यू छूना चाहता है। हर औरत को और जिन हाथों से वो किसी परायी औरत को छूता है। फिर क्यूँ उन्ही हाथों से अपनी पत्नी को छूता है।अगर एक पुरुष के छूने से एक औरत अपवित्र होती है। तो उस औरत को छूकर पुरूष कैसे पवित्र रह जाता है।उन्हीअपवित्र हाथों के छूने से उसकी बीवी उसकी बेटी कैसे पवित्र रह सकती हैं । यह किसी ने सोचा नहीं 

जो खेल वो घर से बाहर हर दूसरी औरतों के साथ खेलना चाहते हैं ।

अगर वही खेल उनकी अपनी बीवी या बेटी के साथ कोई खेल रहा हो तो। तो पुरुषों के पैर तले जमीन खिसक जाती है।

क्या वो उनको अपना पायेगा या फिर अपने आप को माफ कर पायेगा ??

जो मर्द ऐसे हैं। मेने सिर्फ उनकी ही बात की है। सब खुदपर  ना लें ओर मेरी ये  सही है। य़ा गलत सायद ये बात बहुत सी औरतें अच्छे से समझेंगी ज़िनके साथ ऐसा हुआ   है।य़ा हो रहा है। मैंने अपने जीवन में देखा है। बहुत से दोस्त और यार मित्रों को कि वह अगर कहीं आपस में जाते हैं ।या किसी गैर लड़कियों को देखते हैं। तो तुरंत अपशब्द टिप्पणियां करते हैं। और गलत बातें ही बोलते हैं ।पर अगर वही बातें उनकी बहने या घरवालों के बारे में बोलो उनको बुरा लगता है ।पर वह तुरंत ही दूसरों के बारे में गलत बोलते हैं।

पता नहीं पुरुष को क्या लगता है। कि वह अपने आप को दूसरी बहू बेटियों को देखकर रोक नहीं पाते हैं ।कुछ गलत कहने से क्या जो ऐसी बातें करते हैं। क्या वह अपने घर में अपनी बहू बेटियों को भी इसी निगाह से देखते हैं। पता नहीं पर पता नहीं क्यों ऐसा लिखने को मन कहा समाज को देखते हुए।

जो कि देखा जाए वही माताएं बहने को पुरुष को जन्म देती हैं। उसी को शुरू से अंत तक अपनी बढ़ती जवानी में छोड़ना नहीं चाहते हैं ।उसको निचोड़ लेना चाहते हैं। इतनी गंदी मानसिकता लोग रखते हैं। हर चीज का एक समय होता है।

मैं अपील करता हूं। पुरुषों से कि वह अपनी इस हवस पन के शिकार को बदलें जिससे इस समाज में पुरुषों को लोग गंदी नजर से ना देख सके। और अपने आसपास की बहू बेटियों को उन नोच खाने वालों से बचाएं और सुरक्षित करें कल का सूरज दिखाने वाली यही माताएं बहने है ।जो धरती पर पुरुषों से अपने आप को असुरक्षित महसूस करती हैं।जो धरती पर अनेकों रंग रूपों में इंसानों को जन्म देती हैं ।शायद यह ना होती तो आज इस धरती पर इंसानों का जन्म ना होता।

यह हर पुरुषों का नारा होना चाहिए।

“पुरुषों की जिम्मेदारी सुरक्षित हो हर नारी”

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